इच्छा , जिन्दगी और जरुरत

इच्छा , जिन्दगी और जरुरत 

आज जिन्दगी छोटी है
आज जररुते बहुत है
कयोंकि आज इच्छाए बहुत  है
आज इच्छा जररूत है
और जररूत जिन्दगी है
इसलिए आज जिन्दगी तेज है

जब नहीं थी जररूत स्कूटर की
तो शरीर दुरुस्त था

जय नहीं थी जरूरत टेलीविज़न की
तो परिवार में मेलजोल था

जब नहीं थी जररूत मोबाइल की
तो आपस में जोड़ था

जब नहीं था बर्गर, पिज़्ज़ा
तब स्वाद बेमिसाल था

जब नहीं था इंटरनेट
तब भी होता था सारा काम

तब जिन्दगी थी बड़ी
परन्तु करते थे शरीर से मेहनत

रेत की तरह हाथ से फिसल जाती है
कयोंकि  आज जिन्दगी तेज है
कयोंकि आज इच्छाए बहुत  है
आज इच्छा जररूत है
और जररूत जिन्दगी है

ज़िंदगी की कहानी

आज मैंने एक बहुत ही अच्छी कविता पढ़ी जिसमे  लिखने वाले ने ज़िंदगी को बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में ब्यान किया है 

कविता इस  प्रकार है , लेखक को आभार 

कोई खुशियों की चाहत में रोया,
कोई दुखों की पनाह में रोया.

अजीब सिलसिला है,
इस ज़िन्दगी का.

कोई भरोसे के लिए रोया,                        
कोई भरोसा कर के रोया.!

"खुशी" ने वादा किया था वो, 
पांच दिन बाद लौट आएगी.

पर जब हमने "ज़िन्दगी" की,
किताब खोल कर देखी.

तो कमबख्त ज़िन्दगी ही, 
चार दिन की थी.!